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धर्मसम्राट करपात्री महाराज युग पुरुष थे - मेगास्टार आज़ाद


करपात्री महाराज को स्नेह वंदन करते हुए संस्कृत पुनरुत्थान के महानायक आज़ाद ने कहा की धर्मसम्राट करपात्री महाराज युग पुरुष थे |

जब वह केवल आठ वर्ष के बालक थे तबसे ही उनकी प्रवृत्ति विलक्षण थी। किसी से अधिक नही बोलते थे | कभी उंचे पर्वतों पहाड़ों पर चढ़कर घंटों एकान्त बैठकर कुछ सोचते विचारते रहते थे । एक दिन वह घर से भाग गए । पिता और बड़े भाईयों नें ढूंढकर पकड़कर वापस लाया। कुछ समय पश्चात वह फिर भाग गए । पिता और भाई ढूंढकर लाये। डांटा,फटकारा अगर फिर से भागा तो तुझे बहुत पीटेंगे समझा ! वह बोले मुझे सत्य की खोज करनी है पिताजी मुझे जाने दीजिऐ। पिता ने उनकी प्रवृत्ति जानकर घर पर ही पढ़ाना शुरु कर दिया कि कहीं फिर से न भाग जाऐ इसलिए पिता ने दस वर्षीय बालक करपात्री महाराज का विवाह करने का विचार किया।

नववर्षीया सौभाग्यवती नाम की कन्या से बालक का विवाह सम्पन्न हुआ। किन्तु विवाह के बाद भी उनकी प्रवृत्ति न बदली। पूजन अर्चन नामस्मरण ग्रन्थों का पठन पाठन यही उनकी चर्या रहती। एक दिन करपात्री महाराज भाग ही रहे थे कि कभी वापस न आऊंगा तो पिताजी ने पकड़ लिया। तब वह बोले -"पिताजी मेरी मेरी गृहस्थी धर्म में आसक्ति नही होती मुझे जाना है। "ठीक है बेटा लेकिन मेरी एक इच्छा है कि वंशपरम्परा का उच्छेद न हो इसलिए हम तुम्हारी एक सन्तान चाहते है। उसके बाद मै तुम्हे रोकूंगा नही-पिताजी नें कहा। तब वह बोले ;ठीक है पिता जी लेकिन वचन दीजिए उसके बाद आप मेरा मार्ग नही रोकेंगे।हां बेटा मैं वचन देता हूं। अब वह किशोर गृहस्थ हो गया लेकिन दिनचर्या पहले जैसी ही रही।१७ वर्ष की अवस्था में उनके घर मे भगवती स्वरूपा कन्या नें जन्म लिया। अब किशोर जाने की उद्यत हुआ। पिता सामने खड़े थे। माता दौड़कर गले से लिपट पड़ी बेटा तू मुझे छोडकर नही जा सकता।वह बोला अपने आंसू रोक दे मां आज मैं नही रुकूंगा । लेकिन तेरे बिना मैं कैसे रहूंगी?"जैसे आचार्य शंकर के बिना उनकी मां रही थी वैसे तू भी रहना मां। सनातन धर्म पर संकट छाया है मुझे भारतभूमि का ऋण चुकाना है।मैने तेरे गर्भ का आश्रय लिया तेरी छाती का रक्त पिया है तुझे वचन देता हूं तेरा दूध कलंकित न होने दूंगा।"उतने मे नवजात बालिका को गोद में लिऐ पत्नी ने चरण पकड़ लिए नाथ मत जाईऐ सती स्त्री का प्राण केवल उसका पति होता है!वह बोला -यह तुम्हारे भी माता पिता है इनकी सेवा करो। पिता का वात्सल्य भाईयों का स्नेह मां की ममता पत्नी का प्रेम सन्तान का मोह सब को तिनके के समान त्यागकर वह किशोर चला गया।२४ वर्ष की अवस्था में वह युवा "#धर्मसम्राटकरपात्रीजी_महाराज" के नाम से विख्यात हुआ।

जब भारतवर्ष यूरोपीय साम्राज्यवाद के खूनी पंजों से जकड़ा हुआ था।सनातन मूल्यों और संस्कृति का ह्रास हो रहा था तब उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिला ग्राम भटनी में सरयूपारीण वेदपाठी ब्राह्मण श्री रामनिधि ओझा तथा परमधार्मिक शिवरानी के आंगन में सम्वत्१९६४ में श्रावण शुक्ला द्वितीया सन् १९०७ को एक महापुरुष का अवतरण हुआ।इनका बचपन का नाम '#हरनारायण_ओझा' था।ये रामनिधि के तीन पुत्रों मे सबसे छोटे थे।१७ वर्ष की अवस्था में हरनारायण गृहत्यागकर प्रयाग से होकर गुजर रहे थे।कुछ दूरी पर हरनारायण ने देखा कि वटवृक्ष के नीचे एक कोपीनमात्रधारी अवधूत आंखे बंद किए बैठे हैं।हरनारायण पास आकर उनके तेज को निहारने लगे।अवधूत ने अन्तर्चक्षु से किशोर को देख लिया और चर्मचक्षुओं को उन्मीलित करते हुऐ कहा;"आओ मेरे बच्चे मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था।तुम नरवर जाओ और अध्ययन करो उसके पश्चात तुम मेरे पास आना।तुम पर सरस्वती की विशेष कृपा रहेगी।"

यही अवधूत शिरोमणि कुछ काल पश्चात १६५ वर्षों से बंद पड़ी आदिशंकर द्वारा स्थापित ज्योतिष्पीठ का उद्धार कर "#उत्तराम्नायज्योतिष्पीठोद्धारकश्रीमज्जगद्गुरूशंकराचार्यब्रह्मानंद_सरस्वती"कहलाऐ।

हरनारायण पुण्यतोया गंगा के किनारे किनारे आगे बढे।नरवर पहुंचकर उन्होनें वहां देखा कि #तपोमूर्तिजीवनदत्तब्रह्मचारी जी की अध्यक्षता में प्राचीन गुरूशिष्य परम्परा के अनुसार अध्यापन हो रहा है।एक दण्डी सन्यासी भी वहां विराजित है।वह थे #तर्कवाचस्पतिषड्दर्शनाचार्यविश्वेश्वराश्रम_स्वामी।इन्होनें हरनारायण को शिष्य बनाकर व्याकरण शास्त्र,साङ्गोपाङ्ग वेद व षड्दर्शन का गूढ़ अध्ययन करवाया और इनका नाम "हरिहर चैतन्य"रखा।हरिहर की स्मरण शक्ति #फोटोग्रैफिक थी।

एक बार जिस चीज को पढ़ लेते वर्षों बाद भी बता देते कि इस ग्रंथ में इतने पृष्ठ पर है।

इसके बाद हरिहर ने अच्युतमुनि से संस्कृतसाहित्य व पुराणों का अध्ययन किया।अब हरिहर चैतन्य का तप की तरफ आकर्षण हुआ।

अध्ययन से विरत हो वह तरूण तपस्वी उत्तराखंड की हिम से आच्छादित हिमालय की तलहटियों में तीव्र योगश्चर्या करने लगे।

कौपीनमात्र धारण करना निरावरणचरण से यात्रा करना शीतोष्ण भयंकर द्वंदों को सहन करना १९ वर्ष की अवस्था में ही इनका स्वभाव बन गया था।

कुछ समय पश्चात२४वर्षीय हरिहर चैतन्य ने ब्रह्मानंद सरस्वती जी के पास आकर उनसे वेदान्त का गूढ़तम अध्ययन कर #शिखासूत्र का त्यागकर विधिवत #दण्ड ग्रहणकर #नैष्ठिकब्रह्मचर्यपूर्वक सन्यास की दीक्षा ली।अब हरिहर चैतन्य "#परमहंसपरिव्राजकाचार्यहरिहरानंदसरस्वती #करपात्र_स्वामी"कहलाए।

वह #शंकराचार्यब्रह्मानंदसरस्वती जी से दण्डग्रहण कर प्रयाग पहुंचे।सर्वप्रथम लोगों में यह चर्चा फैली कि "गंगातट पर एक कौपीनमात्रधारी युवा महात्मा विचरण करते हुए आ रहे हैं।

मस्तक पर ऐसा ब्रह्मतेज मानो साक्षात भुवनभास्कर ही उदित हो गऐ हों।उन्हे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात सन्यास ही मूर्तिमान होकर आया हो।वह केवल हाथ पर ही भिक्षा ग्रहण करते हैं वह भी केवल ब्राह्मणों के घर से।नमक और चीनी ग्रहण नही करते।

कर को ही पात्र बना भिक्षा ग्रहण करते हैं इसीलिऐ वह '#करपात्रीजी'के नाम से प्रसिद्ध है।(#करःएवपात्रंयस्यसः)कोई संग्रह-परिग्रह नही परमनिष्काम परमविरक्त।वह केवल संस्कृत में ही सम्भाषण करते है।वह निरावरण चरणों से पैदल यात्रा करते हैं कभी सवारी नही करते।वह हरेक विषय का #वेदप्रामाण्य से युक्तियुक्त सुन्दर समाधान करते हैं।सुस्पष्ट प्रखरवाणी अगाध पाण्डित्य से युक्त वेदपद्धति के पूर्णसमर्थक हैं।वह नरवर के #विश्वेश्वराश्रमस्वामी से शिक्षित व ब्रह्मानंदसरस्वती से दीक्षित हैं।"

फिर तो सन्तसमुदाय और जनसमुदाय उनके दर्शनार्थ उमड़ पडा।महान ब्रह्मवेत्ता #उड़िया_बाबा स्वयं उनके दर्शनार्थ चलकर आऐ।उनको आते देख करपात्री जी ने गुरुदृष्टि रखने के कारण उड़िया बाबा को दण्डवत किया।

इस तरह उनके अगाध दर्शनशास्त्र के पाण्डित्य, ब्रह्मविद्या व अद्भुत प्रवचन कुशलता से सन्तसमाज मे बौद्धिकवर्ग में क्रान्ति का प्रसार हो गया।

आगरा जिला मे एक #ब्रह्मसत्र का आयोजन हुआ जिसमे दण्डीस्वामी विश्वेश्वराश्रम जी,उड़िया बाबा,#अखण्डानन्द_सरस्वती प्रभृति विभूतियां तथा भारतवर्ष के हजारों धुरन्धर विद्वान एकत्र हुऐ।वहां दस हजार के लगभग जनसमुदाय एकत्र होता था।

उड़िया बाबा ने वेदान्त पर प्रवचन कर विद्वत्समाज को मंत्रमुग्ध कर दिया।

करपात्री जी को गीता के पन्द्रहवें अध्याय पर प्रवचन करने को कहा गया।परन्तु करपात्री जी मस्ती में आ गऐ और "#श्रीभगवान्उवाच"केवल इस पद पर सात दिन तक प्रवचन करते रहे।समग्र ऐश्वर्य,धर्म,श्री,यश,ज्ञान तथा वैराग्य श्रीकृष्ण में किस प्रकार है।विभिन्न मतों के अनुसार इसका ही सप्तदिवस पर्यन्त वर्णन करते रहे।

उनकी देखा देखी अखण्डानंद सरस्वती ने भी पंचदशी के"#आत्मानम्चेत्विजानीयात्"इस वचन सात दिनों तक व्याख्यान किया।सप्ताहव्यापि यह एक ऐतिहासिक ब्रह्मसत्र था।

धर्मशास्त्रों में इनके अगाध पाण्डित्य को देखकर इन्हें '#धर्मसम्राट' की उपाधि से विभूषित किया गया।#शारीरकमीमांसा के अद्भुत व्याख्याता होने के कारण यह"#अभिनव_शंकर"के नाम से अभिहित हुऐ।

#श्रीविद्या में दीक्षित होने के कारण इनको '#षोडशानंदनाथ'कहा गया।अब यह "धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज"के नाम से अखिल भारतवर्ष में प्रतिष्ठित हो गए।

ज्योतिर्मठ शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती ने इन्हे अगला शंकराचार्य घोषित करना चाहा परन्तु करपात्री जी ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि इस पद के सीमा में रहकर मैं सनातन मूल्यों का प्रकाश स्वच्छंद होकर नही कर पाऊंगा।तब ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने '#कृष्णबोधाश्रमजी_महाराज' को अपना उत्तराधिकारी बनाया।कृष्णबोधाश्रम जी महान ज्ञानी थे।

करपात्री जी ने धर्मोद्धार की भावना से अखिल भारतवर्ष में हजारों महायज्ञों के आयोजन किए।गंगातट पर घास फूंस की झोपड़ी डालकर रहते थे। प्रातः एक बजे उठकर दो घंटा भ्रमण तदन्तर शौचादि से निवृत्त हो 3 घण्टा ध्यान पश्चात रुद्राष्टाध्यायी से रुद्राभिषेक,शालग्रामादि का श्रीयन्त्रादि का पूजन व अढ़ाई घंटे में शीर्षासन में स्थित होकर सम्पुट सप्तशती का पाठ तदन्तर स्वाध्याय तदनन्तर शिष्यों को पढ़ाना व जिज्ञासुओं की जिज्ञासाओं का समाधान,त्रिकाल स्नान व ध्यान तथा २४घण्टे में एक बार भिक्षाटन सांय सूर्यास्त से पूर्व।

यह थी धर्मसम्राट करपात्र स्वामी की दिनचर्या।

उनके साथ सत्संगार्थ संतजन पधारते रहते फक्कड़ों का सत्संग चला रहता।

बाद में उन्होंने नियम और कठोर कर दिया सात दिन तक गंगाजल पर आश्रित रहकर आठवें दिन भिक्षाटन करते।

👉#शास्त्रार्थ=

करपात्र स्वामी वेदविरुद्ध मतावलम्बि आचार्यों की चुनौती को कभी सहन नही करते थे।एकबार वह देवास से हरिद्वार आऐ तो सुना कि #मध्वाचार्यविद्यामान्यतीर्थ ने #अद्वैतमत को आसुरी मत घोषित किया है तो करपात्र स्वामी सिंहगर्जना करते हुऐ बोले इतने बड़े बड़े विद्वानों ने सबने अद्वैतमत का पराभव कैसे स्वीकार कर लिया किसी ने कुछ कहा क्यूं नही? उनकी गर्जना सुनकर सभी बोले महाराज हम शास्त्रार्थ के लिऐ तैयार है आप मध्यस्थ हो जाइऐ। करपात्र स्वामी बोले मध्यस्थ होके क्या प्रयोजन अब तो शास्त्रार्थ केवल हम करेंगे आप लोग बस व्यवस्था कर दें।

शास्त्रार्थ का समय और स्थान निर्णीत हुआ।प्रथम दिवस तो करपात्र स्वामी विद्यामान्यतीर्थ का मत शान्तिधैर्यपूर्वक सुनते रहे।द्वितीय दिवस निर्णय होना था जैसे ही करपात्र स्वामी बोलने को उद्यत हुऐ तो विद्यामान्यतीर्थ को मौन साधके वहां से प्रस्थान करने के अलावा कोई विकल्प न दिखा।

महान जन समुदाय के "धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज की जय हो"के नारों से आकाश गूंज उठा" करपात्र स्वामी ने सबको शान्त करते कहा हमारी जय न कहिऐ धर्म की जय कहिऐ क्योंकि धर्म की ही #जयति होती है।

हरिद्वार के सन्तों और मण्डलेश्वरों ने करपात्र स्वामी को बड़ी ही सुन्दर #महर्धरुद्राक्ष माला और फल भेंटकर निवेदन किया कि यदि आपकी अनुमति हो तो हम #विजयोत्सवयात्रा निकालना चाहते हैं और आपको हाथी पर चढ़ाकर नगरयात्रा करवाऐंगे।करपात्री जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा यह कथमपि उचित नही है।शास्त्रार्थ तत्वबोध के लिऐ होता है।"#वादेवादेजायतेतत्वबोधः"किसी के पराभव या निरादर के लिऐ नही।#विद्याविवादकेलिऐकभीनहीहोती।अब इस बात को यहीं रोक दीजिऐ।

आर्यसमाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती के निर्वाण शताब्दी समारोह पर आर्यसमाज के विद्वान कहलाने वाले तथाकथित विद्वानों ने काशी में घोषणा की कि हम यहां मूर्तिपूजा,अवतारवाद,जन्मना वर्णव्यवस्था मरणश्राद्धादि का खण्डन करेंगे कोई भी हमारे साथ शास्त्रार्थ हेतु उपस्थित हो सकता है।करपात्र स्वामी इस चुनौती को भला कैसे स्वीकार कर सकते थे।उन्होनें तुरन्त काशी विद्वतपरिषद् को आज्ञा दी सनातन धर्म मे कोई विरोधी हस्तक्षेप करने का अधिकारी नही है,सनातन सिद्धान्त की रक्षा की जाऐगी अतः उचित व्यवस्था की जाऐ।

यह बात आग की तरह फैल गई फिर तो दिग दिगन्तर से जन सैलाब उमड़ने लगा।आर्यसमाजियों ने असफल प्रयास किया परन्तु जिस तरह सूर्य के सामने अन्धकार कभी नही टिक सकता वैसे ही अधकचरों की करपात्री जी के समक्ष क्या वार्ता। इसीतरह तर्कधुरन्धर #मदनमोहनमालवीय जी ने भी करपात्री जी से शास्त्रार्थ में भूल की ।कारण था कि मालवीय भी गान्धी की तरह वर्णाश्रम मर्यादा का उल्लंघन कर सभी लोगों का देवालयों में प्रवेश व प्रणवमन्त्र की दीक्षा स्त्र्यादिकों को व अन्त्यजादिकों को देना प्रारम्भ कर दिया। करपात्री जी ने विरोध किया तो मालवीय ने पुराणों का प्रमाण बताकर अपने को सही सिद्ध करना चाहा और शास्त्रार्थ की चुनौती दे डाली बेचारे मालवीय को अन्त में नतमस्तक होना पड़ा व प्रणवमन्त्र की दीक्षा सभी को देने से हट गऐ।करपात्री जी उनका बडा आदर करते थे उन्हे महान विभूति बताते थे।परंतु जब वेदोक्त सनातन वर्णाश्रमधर्म मर्यादा पर कोई कुठाराघात करे तो सहन नही कर पाते थे।

करपात्री जी ने अपना अधिकांश जीवन काशी में व्यतीत किया।काशी से उन्हे बहुत लगाव था।काशीवास उन्हे अत्यन्त प्रिय था।महाराज की मान्यता थी कि काशी मे भगवान विश्वनाथ द्वारा मुक्ति का सदाव्रत चलता रहता है #मङ्गलंमरणंयत्र........।

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